राष्ट्रीय बौद्ध महासभा ने मनाई माता सावित्रीबाई फुले की जयंती
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)
राष्ट्रीय बौद्ध महासभा के तत्वाधान में माता सावित्री बाई फुले जयंती पखवाड़ा के उपलक्ष्य में पंचशील बुद्ध विहार बेरखेड़ी चौराहा पर तथागत गौतम बुद्ध, बोधिसत्व बाबासाहेब अंबेडकर एवं माता सावित्रीबाई फुले की छायाचित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर माता सावित्री बाई फुले की जयंती मनाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वृन्दावन लाल अहिरवार, आर बी एम कोषाध्यक्ष के द्वारा की गई। इस अवसर पर राष्ट्रीय बौद्ध महासभा के पूर्व आईटी सेल प्रभारी मुकेश बौद्ध के द्वारा बताया गया कि दिनांक 1 जनवरी को 208 वां "शौर्य दिवस" भीमा कोरेगांव की क्रांति, 3 जनवरी को माता सावित्रीबाई फुले की जयंती एवं 4 जनवरी संत चोखा मेला जी की संयुक्त जयंती पखवाड़ा के अंतर्गत विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। जिसमे शौर्य दिवस भीमा कोरेगांव में 500 महार सैनिकों के द्वारा पेशवाओ की 28000 की सेना परास्त किया गया था। जिसको बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा 1 जनवरी 1927 को भीमा कोरेगांव पहुंचकर विजय स्तंभ का दौरा किया तभी से यह स्थान दलित गौरव का प्रतीक बन गया, हर साल लाखों लोग विजय स्तंभ पर पहुंचकर शौर्य दिवस मनाते है। इसके उपरांत माता सावित्री बाई फुले के जीवन संघर्ष के बारे में बताया गया की माता सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को सतारा जिले के नया गांव महाराष्ट्र में हुआ था उनके पति महात्मा ज्योतिबा फूल के द्वारा उनको शिक्षित किया और उनको शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहित किया देश की प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में उन्होंने वंचित समुदाय की महिलाओं के लिए प्रथम विद्यालय पुणे के भीलवाड़ा में 1 जनवरी 1848 को खोल इसमें उनके साथ माता फातिमा शेख भी साथ थी और अध्यापक के रूप में सहयोग करती थी इसके उपरांत उन्होंने तीन विद्यालय और खुले समाज सुधार में माता सावित्रीबाई फुले के द्वारा सती प्रथा बाल विवाह जैसी कृतियों के खिलाफ संघर्ष किया और विधवाओं के कल्याण के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना भी की और समाज का कार्यों में सक्रिय भूमिका रही।
उनका साहित्य में भी रहा है योगदान-- 52 काशी सुबोध रत्नाकर उनकी प्रमुख कृति है 10 मार्च 1897 में फ्लैट की महामारी के दौरान मरीजों की सेवा करते हुए वह इस बीमारी की चपेट में आ गई और उनका निधन हो गया । उनका समाज के लिए यह अतुलनीय योगदान इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है । इसी प्रकार संत चोखा मेला जी का जन्म 13वीं शताब्दी में हुआ और उन्होंने महार जाति जो उसे समय अछूत कहलाते थे जाति के आधार पर काफी भेदभाव हुआ करता था उसके लिए उन्होंने भक्ति के माध्यम से आंदोलन चलाया था उसकी भी विस्तृत जानकारी प्रदान की गई। इस अवसर पर पंचशील बुद्ध विहार समिति अध्यक्ष रमेश बौद्ध, कमल सिंह बौद्ध ,टीकाराम बौद्ध ,वृन्दावन लाल अहिरवार,हीरा लाल अहिरवार, फूल सिंह, टीकाराम कबाड़ी, पप्पू मिस्त्री बौद्ध, शिवराज अहिरवार, नरेश बौद्ध, राकेश बौद्ध, संतोष अहिरवार, सुभम,चिरजीवी बाई, राधा बौद्ध,संगीता बौद्ध ,क्रांति बौद्ध सहित उपासक उपासिकाएँ उपस्थित रहे।

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