US पब्लिक स्कूलों में नामांकन में बड़ी गिरावट दर्ज
वॉशिंगटन: अमेरिका में लगातार गिरती जन्म दर का अब वहां की शिक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है। देशभर के सरकारी (पब्लिक) स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी आई है, जिसके कारण प्रशासन को कई स्कूलों को स्थायी रूप से बंद करने का कठिन निर्णय लेना पड़ रहा है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, साल 2010 के बाद से ही किंडरगार्टन से लेकर 12वीं कक्षा तक के छात्रों के नामांकन में गिरावट देखी जा रही थी, लेकिन कोरोना महामारी के बाद यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है।
बड़े शहरों में 20 प्रतिशत तक घटी छात्रों की संख्या
छात्रों की संख्या में कमी का सबसे ज्यादा असर अमेरिका के बड़े महानगरों में देखने को मिल रहा है। न्यूयॉर्क, शिकागो और लॉस एंजिलिस जैसे शहरों के कई स्कूल जिलों में छात्रों की संख्या में 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। स्कूलों में बच्चों की कमी का सीधा मतलब है कि अब उन स्कूलों को चलाने के लिए मिलने वाली सरकारी मदद और संसाधनों में भी कटौती की जाएगी। कई इलाकों में तो स्कूल की इमारतें खाली पड़ी हैं, क्योंकि वहां दाखिला लेने के लिए पर्याप्त बच्चे ही नहीं मिल रहे हैं।
महंगाई और कम जन्म दर हैं मुख्य कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। पहला कारण अमेरिका में जन्म दर का लगातार कम होना है, जिससे स्कूलों में आने वाली नई पीढ़ी की संख्या घट गई है। इसके अलावा, बढ़ती महंगाई और रहने के खर्च (Cost of Living) की वजह से मध्यम वर्ग के परिवार अब कम बच्चे पैदा कर रहे हैं या फिर महंगे शहरों को छोड़कर दूसरे इलाकों में जा रहे हैं। साथ ही, इमिग्रेशन यानी आप्रवासन नीतियों में बदलाव को भी इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है, जिससे बाहर से आने वाले परिवारों की संख्या पर असर पड़ा है।
शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर मंडराता खतरा
राष्ट्रीय शिक्षा सांख्यिकी केंद्र (NCES) के अनुसार, आने वाले कुछ सालों तक छात्र संख्या में यह गिरावट इसी तरह जारी रह सकती है। इसका सीधा असर भविष्य की शिक्षा नीतियों और शिक्षकों की नौकरियों पर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि अगर छात्रों की संख्या इसी रफ्तार से कम होती रही, तो सरकार को शिक्षा बजट में बड़े बदलाव करने पड़ेंगे और छोटे स्कूलों को आपस में मिलाना पड़ेगा। यह बदलाव न केवल अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था बल्कि उसकी भविष्य की कार्यशक्ति (Workforce) के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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