अमेरिकी सीनेट में एक वोट का बड़ा असर, ईरान पर हमले रोकने का प्रस्ताव हुआ खारिज
वाशिंगटन| संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की असीमित सैन्य शक्तियों पर नकेल कसने और पाबंदियां लगाने की कोशिश को एक बड़ा झटका लगा है। ईरान के खिलाफ भविष्य में किसी भी नए सैन्य हमले या अभियान को शुरू करने से पहले अमेरिकी कांग्रेस की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाने वाला एक अहम प्रस्ताव अमेरिकी सीनेट में महज एक वोट के अंतर से गिर गया। इस चुनावी और विधायी नतीजे के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को फिलहाल बहुत बड़ी राहत मिली है।
किस तरह से सीनेट में गिरा यह प्रस्ताव?
अमेरिकी सीनेट में इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव को लेकर हुई कड़े मुकाबले वाली वोटिंग में 49 सांसदों ने इसके समर्थन में अपना वोट डाला, जबकि 50 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। एक वोट के इस मामूली अंतर के चलते यह प्रस्ताव बहुमत हासिल नहीं कर सका और पारित होने से चूक गया। इस पूरी वोटिंग के दौरान पेंसिल्वेनिया से रिपब्लिकन सीनेटर डेव मैकॉर्मिक किन्हीं कारणों से मतदान प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वह सदन में मौजूद रहते और प्रस्ताव के पक्ष में अपना मत देते, तो इस मतदान का पूरा परिणाम पूरी तरह बदल सकता था।
क्या था इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य?
इस विधायी प्रस्ताव का मुख्य मकसद यह कानूनी रूप से सुनिश्चित करना था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के विरुद्ध कोई भी नया सैन्य कदम उठाने या युद्ध जैसी कार्रवाई शुरू करने से पहले अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अवश्य लें। यदि यह प्रस्ताव सीनेट से पास हो जाता, तो राष्ट्रपति अकेले दम पर युद्ध या बड़े सैन्य टकराव जैसे गंभीर निर्णय नहीं ले पा0ते। फिलहाल यह प्रस्ताव सीनेट की विदेश मामलों की समिति में लंबित पड़ा है। इसे सदन में लाने वाले सांसद यह चाहते थे कि इसे समितियों की लंबी प्रक्रिया से बचाकर सीधे पूरी सीनेट में चर्चा और मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाए, लेकिन पर्याप्त संख्याबल और समर्थन न मिलने के कारण उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई।
अमेरिकी हमलों के बाद उठी थी नियंत्रण की मांग
हाल के हफ्तों के दौरान ईरान के ठिकानों पर अमेरिकी वायु सेना द्वारा किए गए ताबड़तोड़ हमलों के बाद, विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों के साथ-साथ कुछ बागी रिपब्लिकन सांसदों ने भी राष्ट्रपति की मनमानी सैन्य शक्तियों पर कड़ा नियंत्रण लगाने की मांग को काफी तेज कर दिया था। इन सांसदों का यह तर्क था कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक देश में युद्ध घोषित करने या सैन्य कार्रवाई का अंतिम अधिकार केवल कांग्रेस के पास निहित है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे तमाम बड़े फैसले संसद की सहमति के बाद ही लिए जाने चाहिए।
रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने क्यों किया इसका विरोध?
दूसरी ओर, सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश सांसदों ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया। उनका तर्क था कि देश की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अति संवेदनशील मामलों में राष्ट्रपति के पास त्वरित और कड़े फैसले लेने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनका यह भी मानना है कि किसी भी आपातकालीन या संकट की स्थिति में लंबी और जटिल संसदीय प्रक्रियाओं से गुजरना देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भारी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
अब आगे क्या होगी राजनीतिक स्थिति?
इस प्रस्ताव के सीनेट में खारिज हो जाने के बाद अब इसे दोबारा पुनर्जीवित करने के लिए इसके समर्थक सांसदों को नए सिरे से कड़े प्रयास करने होंगे। फिलहाल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी और सैन्य शक्तियों में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हुआ है। इसके बावजूद, ईरान से जुड़े मामलों और अमेरिकी सामरिक नीतियों को लेकर देश के राजनीतिक गलियारों में गरमागरम बहस और खींचतान लंबी चलने की पूरी संभावना बनी हुई है।






























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