स्कूल से निकाले गए दिव्यांग बच्चों को राहत, हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जबलपुर: दिव्यांग बच्चों के शिक्षा के अधिकार को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और मानवीय रुख अपनाया है। विजडम वैली और जीडी गोयनका स्कूल द्वारा विशेष बच्चों को बाहर किए जाने के मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समाज के इस वर्ग के साथ किसी भी प्रकार का पक्षपात स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अदालत का कड़ा रुख और आदेश
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा की डिवीजन बेंच ने जबलपुर निवासी सौरभ सुबैया द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट की मुख्य बातें निम्नलिखित रहीं:
भेदभाव पर प्रहार: अदालत ने कहा कि दिव्यांग बच्चों को स्कूल से निकालना न केवल गलत है, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।
तत्काल रोक: कोर्ट ने दोनों स्कूलों द्वारा बच्चों को निकाले जाने के आदेश पर स्टे लगा दिया है।
जवाब तलब: मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को नोटिस जारी कर इस संबंध में विस्तृत जवाब मांगा गया है।
कानून के उल्लंघन का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के समक्ष जिले की शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर किया:
स्पेशल एजुकेटर्स का अभाव: जिले के लगभग 150 स्कूलों (50 निजी और 100 सरकारी) में दिव्यांग बच्चों की बड़ी संख्या है, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए अनिवार्य स्पेशल एजुकेटर नियुक्त नहीं किए गए हैं।
अधिनियमों की अनदेखी: याचिका में दलील दी गई कि यह 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016' और 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009' का स्पष्ट उल्लंघन है। कानून के तहत हर स्कूल में विशेष शिक्षकों की मौजूदगी अनिवार्य है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
समावेशी शिक्षा की जीत
याचिकाकर्ता के अनुसार, हाई कोर्ट का यह हस्तक्षेप न केवल उन बच्चों के लिए राहत लेकर आया है जिन्हें स्कूल से निकाला गया था, बल्कि यह पूरे प्रदेश में समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के ढांचे को मजबूत करेगा। यह आदेश सुनिश्चित करता है कि शारीरिक या मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से अलग न किया जाए।

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