सलामतपुर का 'बोधि वृक्ष' बना वैश्विक आस्था का केंद्र, 24 घंटे सुरक्षा में सांस ले रही बौद्ध विरासत
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)
रायसेन जिले में स्थित सलामतपुर की एक पहाड़ी इन दिनों देश-दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सांची यूनिवर्सिटी परिसर के समीप स्थित यह कोई साधारण पेड़ नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म और वैश्विक शांति का एक जीवंत प्रतीक 'बोधि वृक्ष' है। बीते 14 वर्षों से यह वृक्ष न केवल स्थानीय लोगों बल्कि विदेशी पर्यटकों के लिए भी गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।
श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने 14 साल पहले लगाया था पौधा---इस ऐतिहासिक बोधि वृक्ष की कहानी साल 2012 से जुड़ी है। 21 सितंबर 2012 को सांची में आयोजित प्रथम 'धर्म-धम्म सम्मेलन' के दौरान श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने सलामतपुर के पास एक सुनसान पहाड़ी पर इस पवित्र पौधे को अपने हाथों से रोपा था। तब से लेकर आज तक, यानी पिछले 14 सालों से यह वृक्ष पूरी गरिमा के साथ यहाँ लहलहा रहा है।
24 घंटे तैनात रहती है 'एक-चार' की गार्ड, वीआईपी की तरह होती है देखभाल--इस बोधि वृक्ष का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व इतना अधिक है कि इसकी सुरक्षा और देखभाल किसी वीआईपी (की तरह की जाती है। पहाड़ी पर अकेले खड़े इस पेड़ की सुरक्षा के लिए 'एक-चार' (1-4) की पुलिस गार्ड चौबीसों घंटे तैनात रहती है। पेड़ को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुँचे, इसके लिए बकायदा घेराबंदी की गई है और खाद-पानी से लेकर इसकी सेहत की समय-समय पर निगरानी की जाती है।
भगवान बुद्ध के ज्ञानोदय से जुड़ा है सीधा संबंध--
क्यों खास है यह वृक्ष?
मान्यता है कि यह उसी मूल बोधि वृक्ष का हिस्सा है, जिसके नीचे बैठकर भगवान गौतम बुद्ध ने बिहार के बोधगया में कठिन तपस्या की थी और ज्ञान (बोधि) प्राप्त किया था। इतिहास के अनुसार, सम्राट अशोक के काल में इस मूल वृक्ष की एक शाखा को श्रीलंका ले जाया गया था, जहाँ इसे सहेज कर बड़ा किया गया। साल 2012 में उसी वृक्ष की एक शाखा को श्रीलंका से वापस लाकर यहाँ सलामतपुर की धरती पर रोपा गया।
पर्यटन और आस्था का अनूठा संगम--आज यह स्थान एक प्रमुख पर्यटन स्थल का रूप ले चुका है। सांची स्तूप आने वाले बौद्ध अनुयायी और पर्यटक इस पेड़ के दर्शन करने सलामतपुर जरूर पहुँचते हैं। लोग यहाँ आकर न केवल शांति का अनुभव करते हैं, बल्कि इस ऐतिहासिक पेड़ के साथ सेल्फी और तस्वीरें लेकर अपनी यात्रा को यादगार बनाते हैं। हिंदू धर्म में भी पीपल के वृक्ष को अत्यंत पूजनीय माना जाता है और उसमें देवताओं का वास देखा जाता है, यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर भी इसे लेकर भारी श्रद्धा है।






























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