-भागवत कथा में छठवें दिन रुक्मिणी विवाह का प्रसंग

अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

कस्बे में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। राष्ट्रीय कथा व्यास पंडित देवेन्द्र भार्गव महाराज ने रुक्मणि विवाह का भावपूर्ण वर्णन करते हुए भक्तों को भक्ति, प्रेम और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने बताया गया कि श्रीमद्भागवत  महापुराण के दशम स्कंध में विस्तार से वर्णित है। यह भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीला का एक प्रमुख भाग है, जो सच्चे प्रेम, भक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय को दर्शाता है। विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और गुणवान थीं। वे साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा थीं। रुक्मणि ने बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण की वीरता, गुण और लीलाओं की कथाएं सुनकर उन्हें मन-ही-मन अपना पति चुन लिया था। वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण ही उनके योग्य वर हैं। लेकिन उनके बड़े भाई रुक्मी ने शिशुपाल (चेदि राजा) से उनका विवाह तय कर दिया, क्योंकि रुक्मी को कृष्ण से पुरानी शत्रुता थी और वह शिशुपाल का मित्र था।रुक्मणि का हृदय कृष्ण-प्रेम से भरा था। उन्होंने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को पत्र भेजा। उस पत्र में उन्होंने अपनी मनोदशा व्यक्त की और कृष्ण से प्रार्थना की कि वे कुंडिनपुर (विदर्भ की राजधानी) आएं और उन्हें स्वयंवर से पहले ही हर लें, क्योंकि वे शिशुपाल जैसे अधर्मी से विवाह नहीं करना चाहतीं। पत्र में रुक्मणि ने कहा कि यदि कृष्ण उन्हें नहीं लाए तो वे प्राण त्याग देंगी। यह पत्र पढ़कर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय पिघल गया। वे तुरंत सारथी दारुक के साथ रथ पर सवार हो कुंडिनपुर पहुंचे। उधर रुक्मणि अम्बिका मंदिर में माता पार्वती की पूजा कर रही थीं। पूजा समाप्त कर वे मंदिर से बाहर निकलीं तो कृष्ण का रथ दिखा। श्रीकृष्ण ने रुक्मणि को रथ पर बिठाया और युद्ध की तैयारी में लगे राजाओं को चुनौती दी।

श्रीकृष्ण रुक्मणि को लेकर द्वारका पहुंचे--युद्व की तैयारी में लगे शिशुपाल, जरासंध, रुक्मी और अन्य राजा क्रोधित होकर कृष्ण पर टूट पड़े। लेकिन भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से सभी को परास्त किया। रुक्मी को बंदी बनाया गया, लेकिन रुक्मणि की प्रार्थना पर उसे छोड़ दिया। रुक्मी अपमानित होकर भाग गया और कभी कृष्ण से सामना नहीं किया। इसके बाद श्रीकृष्ण रुक्मणि को लेकर द्वारका पहुंचे। वहां विधि-पूर्वक उनका विवाह संपन्न हुआ। यह विवाह रथ हरण (हरण) के रूप में हुआ, जो स्वयंवर की परंपरा से अलग था, लेकिन रुक्मणि की भक्ति और कृष्ण की कृपा से संभव हुआ। रुक्मणि कृष्ण की प्रियतमा पटरानी बनीं और उनके आठ पुत्र हुए।

सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नही जाती--यह कथा बताती है कि जब जीवात्मा (रुक्मणि) परमात्मा (कृष्ण) को पूर्ण समर्पण से पुकारती है, तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं और अधर्मी शक्तियों को परास्त कर प्रेम का मिलन कराते हैं। सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। रुक्मणि विवाह की यह लीला भक्तों को प्रेम, विश्वास और भगवान की कृपा का अद्भुत संदेश देती है। कार्यक्रम में प्रतिदिन भजन-कीर्तन, आरती एवं प्रसाद वितरण भी किया जा रहा है, जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु सहभागिता कर रहे हैं। कथा समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणि के जयकारों के साथ सुख-समृद्धि और शांति की कामना की।

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28