​भोपाल-विदिशा स्टेट हाईवे-18 की बालमपुर घाटी पर सुरक्षा इंतजाम फेल, जगह-जगह क्षतिग्रस्त रेलिंग से बढ़ा बड़ी दुर्घटनाओं का खतरा।

​अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

भोपाल-विदिशा स्टेट हाईवे-18 पर स्थित बालमपुर घाटी एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन किसी विकास कार्य के लिए नहीं, बल्कि अपनी बदहाली और लगातार बढ़ते सड़क हादसों के कारण। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि अब स्थानीय लोग और इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालक इसे "मौत की घाटी" कहने लगे हैं। इस खतरनाक मोड़ और ढलान पर आए दिन गाड़ियां अनियंत्रित होकर पलट रही हैं। दर्जनों लोग यहाँ अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर आज भी अपंगता का जीवन जीने को मजबूर हैं।इस संवेदनशील ब्लैक स्पॉट पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दावों और वादों की जो दीवार खड़ी की गई थी, वह अब ढह चुकी है।

सुरक्षा कवच ही बना 'डेथ ट्रैप'--लगातार हो रहे जानलेवा हादसों को देखते हुए मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन एमपीआरडीसी ने घाटी के दोनों ओर लोहे की मजबूत सुरक्षा रेलिंग (क्रैश बैरियर) लगवाई थी। उद्देश्य स्पष्ट था कि यदि कोई वाहन अनियंत्रित हो, तो यह रेलिंग उसे खाई में गिरने से रोक ले। लेकिन विडंबना देखिए, जिस रेलिंग को लोगों की जिंदगी महफूज रखने का जिम्मा सौंपा गया था, वह खुद हादसों की भेंट चढ़ चुकी है। 

आज स्थिति यह है कि खाई में समाई रेलिंग--घाटी के कई मोड़ों पर रेलिंग पूरी तरह टूटकर नीचे गहरी खाई में जा गिरी है।और कई स्थानों पर रेलिंग टेढ़ी-मेढ़ी होकर सड़क की तरफ झुक गई है, जो खुद वाहनों के लिए एक नया खतरा बन चुकी है।

और जहां से रेलिंग गायब है, वहां सीधे गहरी खाई है। जरा सी भी चूक सीधे मौत के मुंह में ले जाने के लिए काफी है। 

बारिश के मौसम दोगुना हुआ खतरा--इस मार्ग से प्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े वाहन, यात्री बसें और भारी ट्रक गुजरते हैं। वर्तमान में बारिश का मौसम होने के कारण चुनौती और ज्यादा गंभीर हो गई है। बारिश के दौरान घाटी की घुमावदार सड़क पर जबरदस्त फिसलन हो जाती है। वहीं, सुबह और शाम के वक्त धुंध के कारण विजिबिलिटी (दृश्यता) बेहद कम रह जाती है। वहीं रात के समय इस मार्ग पर पर्याप्त रोशनी न होने से टूटी हुई रेलिंग दिखाई नहीं देती, जिससे वाहन चालकों की धड़कनें बढ़ी रहती हैं।

कागजी सुरक्षा और जमीनी हकीकत में बड़ा फासला--बालमपुर घाटी की यह तस्वीर यह बताने के लिए काफी है कि कागजी सुरक्षा और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला है। जब सुरक्षा के लिए लगाई गई रेलिंग ही सुरक्षित नहीं रही, तो आखिर रोजाना सफर करने वाले इन मासूम वाहन चालकों की जान की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या प्रशासन इस सोई हुई नींद से तब जागेगा जब कोई बड़ी त्रासदी घट जाएगी, या समय रहते इस 'मौत की घाटी' को सुरक्षित मार्ग में बदला जाएगा? यह एक बड़ा और गंभीर सवाल है।

इनका कहना है।

क्षतिग्रस्त और गायब हो चुकी रेलिंग को तुरंत हटाकर नई और मजबूत हाई-क्वालिटी क्रैश बैरियर लगाए जाएं। और घाटी के खतरनाक मोड़ों पर रेडियम संकेतक (रिफ्लेक्टर्स), ब्लिंकर लाइट और 'गति धीमी रखें' के बड़े चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं। वहीं हाईवे अथॉरिटी द्वारा इस पूरे पैच की नियमित निगरानी की जाए ताकि डैमेज होते ही उसे तुरंत सुधारा जा सके।

कालूराम मीणा, सरपंच संघ अध्यक्ष सांची।

स्थानीय नागरिकों का आक्रोश--

"प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है क्या? जब पहले ही कई लोग यहाँ जान गंवा चुके हैं, तो टूटी रेलिंग को ठीक करने में इतनी ढिलाई क्यों? अगर समय रहते इसे नहीं बदला गया, तो कोई बड़ी यात्री बस खाई में पलट सकती है।"

बब्लू पठान, समाजसेवी सलामतपुर।

​​एमपीआरडीसी की इस घोर लापरवाही ने अब सीधे तौर पर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जब सुरक्षा के लिए लगाया गया बुनियादी ढांचा ही महीनों तक टूटा पड़ा रहे, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है।

राकेश मीणा, किसान रातातलाई।

 

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28