-​परंपरागत रास्तों पर आज भी थमी नहीं हैं रबारियों की कदमताल; राजस्थान से मध्य प्रदेश के बीच हर साल बदलती चरागाहों की दास्तान

-​भोपाल-विदिशा स्टेट हाईवे पर थमीं नजरें: एक सजीव सांस्कृतिक यात्रा

अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

​भोपाल-विदिशा स्टेट हाईवे से गुजरते राहगीरों के कदम तब अचानक ठिठक गए, जब रंग-बिरंगी पारंपरिक राजस्थानी पोशाक, सिर पर लाल-सफेद साफा और कंधों पर लाठी लिए लोगों का एक बड़ा काफिला अपने ऊँटों के साथ गुजरता दिखाई दिया। यह कोई आम मुसाफिर नहीं, बल्कि राजस्थान के पारंपरिक ऊँटपालक राइका (रबारी या रेबारी) समुदाय के लोग हैं। तपती धूप और बदलते मौसम की परवाह किए बिना, ये लोग अपने गृह क्षेत्र की ओर लौट रहे हैं। हर साल की तरह इस बार भी इनका यह लंबा सफर जीवन को जिंदा रखने की एक अंतहीन जद्दोजहद की गवाही दे रहा है।

अक्टूबर से जून: चराई के लिए सात महीने का 'प्रवास चक्र'--राइका समुदाय के पाबूराम रबारी के मुताबिक उनका जीवन पूरी तरह से प्रकृति और उनके पशुधन (मुख्यतः ऊँट और भेड़) पर निर्भर करता है। राजस्थान के पाली, जैसलमेर, जोधपुर और उसके आसपास के शुष्क जिलों में जब मानसून के बाद घास और पानी की कमी होने लगती है, तो ये लोग चराई की तलाश में मध्य प्रदेश का रुख करते हैं।

​आगमन (अक्टूबर): मानसून खत्म होते ही यह समुदाय मध्य प्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्रों में प्रवेश करता है। कटाई के बाद खाली हुए खेतों और जंगलों में इनके पशुओं को भोजन मिलता है।

​प्रस्थान (मई से जुलाई): सर्दियों और शुरुआती गर्मियों के करीब सात महीने मध्य प्रदेश में बिताने के बाद, जैसे ही वहां मानसून की आहट होती है और राजस्थान में भी स्थितियां अनुकूल होने लगती हैं, ये अपने वतन लौटने लगते हैं। मई से लेकर जुलाई के बीच इनका वापस जाना तय होता है।

ढाई लाख की आबादी: सिकुड़ते चरागाह और दम तोड़ती परंपरा--

​एक अनुमान के मुताबिक, भारत में राइका/रबारी समुदाय की जनसंख्या लगभग ढाई लाख है। सदियों से इस समुदाय को 'ऊँटों का रक्षक' माना जाता रहा है। लोक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने पार्वती जी के कहने पर ऊँट की रचना की थी और उसकी देखरेख के लिए राइका समुदाय को धरती पर भेजा था।

​"कभी हमारे पास सैकड़ों ऊँट हुआ करते थे, लेकिन अब न तो वो जंगल बचे हैं और न ही वैसी चरागाहें। हाईवे और शहरों के विकास ने हमारे पारंपरिक रास्ते रोक दिए हैं।"

काफिले के साथ चल रहे एक बुजुर्ग तेजाजी राइका ऊँटपालक का दर्द।

​आज कड़वी सच्चाई यह है कि इस ढाई लाख की आबादी में से अब बेहद कम लोग ही पारंपरिक दूरगामी ऊँटपालन से जुड़े रह गए हैं।

नई पीढ़ी का बदलता रुख और भविष्य की चिंताएं--आधुनिक परिवहन के साधनों के आने से ऊँटों की मांग में भारी गिरावट आई है। साथ ही, गोचर भूमियों पर बढ़ते कब्जों और कड़े वन कानूनों के कारण इस घुमंतू जीवनशैली को जारी रखना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। यही वजह है कि राइका समुदाय की नई पीढ़ी अब इस कठिन प्रवासी जीवन से किनारा कर रही है। युवा अब शहरों की ओर रुख कर रहे हैं और मजदूरी या छोटे-मोटे व्यवसायों में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

​भोपाल-विदिशा हाईवे से गुजरता यह काफिला महज कुछ लोगों की यात्रा नहीं है, बल्कि यह दम तोड़ती एक समृद्ध लोक संस्कृति की आखिरी सांसें हैं। यदि समय रहते इन पारंपरिक चरवाहों के लिए चरागाह और ऊँट पालन को बढ़ावा देने वाली नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आने वाले समय में रेगिस्तान के ये जहाज और इनके खेवनहार सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएंगे।

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28