कनिष्क से तिब्बत तक बौद्ध धर्म फैलाया, सांची यूनिवर्सिटी में विशेष व्याख्यान
-तिब्बती भाषा को शास्त्रीय दर्जा देने की मांग
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)
सलामतपुर स्तिथ साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में लद्दाख में बौद्ध दर्शन विषय पर विशिष्ट अतिथि और नई दिल्ली के लद्दाख केंद्रीय शोध संस्थान के निदेशक तथा जम्मू कश्मीर सांस्कृतिक अकादमी के पूर्व मुख्य संपादक डॉ. नवांग सेरिंग शाक्सपो ने व्याख्यान दिया। डॉ. नवांग सेरिंग शाक्सपो ने तिब्बती भाषा के भारत में जन्म की बात कहते हुए तिब्बती भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान करने की मांग की। उनके मुताबिक तिब्बती भाषा अधिकतर हिमालयी राज्यों में बोलचाल में प्रयुक्त होती है। उन्होने कनिष्क द्वारा तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका का भी उल्लेख किया। ड़ॉ शेरिंग ने गुरु पद्मसम्भव कश्मीर में राजा जांग्स्कार के समय हुई चौथी बौद्ध संगीतिका तथा कनिष्क के समय बनाए गए कनिका स्तूप का भी ज़िक्र किया।डॉ. नवांग ने कहा कि पालि के माध्यम से उन्हें बौद्ध दर्शन के मूल तत्व को समझने में काफी मदद मिली। डॉ. नवांग ने बौद्ध दर्शन के अलग-अलग संप्रदायों- थेरवाद, महायान और तंत्रयान के बार में भी बताया। विद्वान वक्ता ने प्रायः 300 पुस्तकों का लेखऩ एवं संपादन किया है। उन्होंने अपनी कुछ पुस्तकें विवि के पुस्तकालय को भेंट की।अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु ने सम्राट अशोक के समय ही लद्दाख के कुछ भागों में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का उल्लेख किया। कनिष्क ने ना सिर्फ लद्दाख अपितु तिब्बत तक बौद्ध धर्म को फैलाया। उन्होने आधुनिक युग में बौद्ध धर्मगुरु कुशक बकुला ने मंगोलिया में भारत के राजदूत के रुप में अविस्मरणीय कार्यों का भी उल्लेख किया। उनके द्वारा भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक संबंध को काफी मजबूती मिली। कुशक बकुला ने लद्दाख के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।साँची विश्वविद्यालय के बौद्ध दर्शऩ विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत विभाग प्रभारी डॉ संतोष प्रियदर्शी द्वारा किया गया। कार्यक्रम के समापन पर धन्यवाद प्रस्ताव डॉ रमेश रोहित ने दिया।

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