सांची के साए में छिपा बौद्ध धरोहरों का अनमोल रत्न 'सुनारी स्तूप', लंदन के संग्रहालयों की शान बनी कलाकृतियां
-आज भी किसी अनमोल ख़ज़ाने से कम नही है सुनारी के स्तूप
-लंदन के संग्रहालयों की शान बने सुनारी के अवशेष
-नक्काशीदार धातु मंजूषाएं और पवित्र अवशेष कनिंघम को मिले थे
-सभी कलाकृतियां लंदन के प्रसिद्ध 'विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय' तथा 'ब्रिटिश संग्रहालय' की दीर्घाओं में हैं प्रदर्शित
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)
मध्यप्रदेश का रायसेन जिला प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास और बौद्ध वास्तुकला का गढ़ रहा है। जब भी हम इस क्षेत्र के बौद्ध इतिहास की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहला नाम 'सांची' का आता है। लेकिन सांची की विश्व प्रसिद्ध पहाड़ियों से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर, सलामतपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल मौजूद है, जो अपने भीतर बौद्ध धर्म के स्वर्ण काल का इतिहास समेटे हुए है। इस ऐतिहासिक धरोहर को 'सुनारी (या सोनारी) के स्तूप' के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं एकांत और शांति की गोद में बसे सुनारी स्तूपों का संपूर्ण इतिहास, उनकी खोज और धार्मिक महत्व।
सम्राट अशोक और मौर्योत्तर काल से जुड़ा स्वर्णिम इतिहास--सुनारी स्तूपों का ऐतिहासिक संबंध तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मौर्योत्तर काल (लगभग 125 से 100 ईसा पूर्व) तक माना जाता है। इतिहासकार बताते हैं कि जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाया और इसके प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया, तब उन्होंने सांची और उसके आसपास के क्षेत्रों को एक विशाल बौद्ध सर्किट के रूप में विकसित किया था। सुनारी इसी पवित्र सर्किट का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा था। जहाँ सांची मुख्य प्रशासनिक और धार्मिक केंद्र था, वहीं सुनारी जैसे स्थल बौद्ध भिक्षुओं की गहन साधना, ध्यान और निवास के लिए विकसित किए गए थे। यहाँ की शांत पहाड़ियाँ भिक्षुओं को एकांत में आत्म-साधना का अद्भुत वातावरण प्रदान करती थीं।
यहीं मिले थे बौद्ध भिक्षुओं के पवित्र अवशेष--
बौद्ध धर्म में सुनारी का ऐतिहासिक महत्व यहाँ से मिले पवित्र धातु (शारीरिक अवशेषों या अस्थियों) के कारण बहुत अधिक है: ऐसा माना जाता है कि महान बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा तीसरी बौद्ध संगीति के बाद जिन धर्म प्रचारकों को हिमालय और अन्य क्षेत्रों में भेजा गया था, उनके पवित्र अवशेष यहाँ सुरक्षित रखे गए थे। यहाँ से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों में मज्झिम और गोतीपुत्र जैसे प्रतिष्ठित बौद्ध भिक्षुओं के नाम ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण मिले हैं।
अलेक्जेंडर कनिंघम की खोज और छिपे हुए खजाने का खुलासा--सदियों तक वक्त के थपेड़ों और घने जंगलों में छिपे रहने के बाद, इस स्थल को आधुनिक दुनिया के सामने लाने का श्रेय प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद् सर अलेक्जेंडर कनिंघम और उनके सहयोगी एफ. सी. मैसी को जाता है। उन्होंने वर्ष 1850-1851 के दौरान इस पहाड़ी पर व्यापक खुदाई का कार्य शुरू किया था। कनिंघम की इस खुदाई ने पूरी दुनिया के इतिहासकारों को चौंका दिया। यहाँ से उन्हें दो मुख्य स्तूप और कई छोटे स्तूपों के अवशेष मिले, जिनके भीतर से बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र और अमूल्य अवशेष प्राप्त हुए।
मुख्य स्तूपों की अनूठी बनावट और ऐतिहासिक अवशेष--सुनारी परिसर में मौजूद स्तूप अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिक साक्ष्यों के लिए जाने जाते हैं:
स्तूप क्रमांक 1 (मुख्य स्तूप): यह इस परिसर का सबसे विशाल और भव्य स्तूप है, जिसे 'सूखी चिनाई' तकनीक से पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। कनिंघम को इस स्तूप के केंद्र से पत्थर से बनी एक प्राचीन धातु मंजूषा मिली थी, जिसमें पवित्र अस्थि अवशेष सुरक्षित रखे गए थे।
स्तूप क्रमांक 2 (कलात्मकता का बेजोड़ नमूना): यह स्तूप आकार में भले ही छोटा है, लेकिन कला की दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण है। इसके भीतर से क्रिस्टल (स्फटिक) की एक बेहद खूबसूरत मंजूषा मिली, जो 'कमल की कली' के आकार में तराशी गई थी। इस पर हाथी, घोड़े, हिरण और पंख वाले काल्पनिक शेरों की आकृतियां उकेरी गई थीं, जो शुंग काल की उच्च कोटि की नक्काशी को दर्शाती हैं।
लंदन के संग्रहालयों की शान बने सुनारी के अवशेष--सुनारी के स्तूपों का धार्मिक महत्व इसलिए भी सबसे ज्यादा है क्योंकि यहाँ से प्राप्त मंजूषाओं पर ब्राह्मी लिपि में प्राचीन बौद्ध भिक्षुओं के नाम उत्कीर्ण थे। इनमें महान भिक्षु 'मज्झिम' और 'गोतीपुत्र' के नाम शामिल हैं। इतिहास के अनुसार, ये वही बौद्ध संत थे जिन्हें सम्राट अशोक के काल में मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा तीसरी बौद्ध संगीति के बाद हिमालयी क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा गया था। प्रचार यात्राओं से लौटने के बाद उनके अवशेषों को इस पावन भूमि पर सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया। भारत की इस ऐतिहासिक और अमूल्य धरोहर से जो नक्काशीदार धातु मंजूषाएं और पवित्र अवशेष कनिंघम को मिले थे, वे आज भारत में नहीं हैं। वर्तमान में ये सभी कलाकृतियां लंदन के प्रसिद्ध 'विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय' तथा 'ब्रिटिश संग्रहालय' की दीर्घाओं में प्रदर्शित हैं और दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।
उपेक्षित लेकिन आत्मिक शांति का केंद्र--आज सुनारी का यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई के संरक्षण में एक केंद्रीय संरक्षित स्मारक है। यहाँ प्राचीन बौद्ध विहारों के ढहे हुए हिस्से भी देखे जा सकते हैं, जहाँ कभी सैकड़ों भिक्षु रहा करते थे। सांची की तुलना में यहाँ पर्यटकों की आवाजाही बहुत कम होती है, जिसके कारण आज भी इस पहाड़ी पर वही प्राचीन शांति, मौन और आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस की जा सकती है जो दो हजार साल पहले रही होगी। इतिहास और अध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए सुनारी-सलामतपुर के ये स्तूप आज भी किसी अनमोल खजाने से कम नहीं हैं।
इनका कहना है।
सुनारी स्तूप क्षेत्र में पर्यटक बहुत कम संख्या में पहुंचते हैं। लेकिन भारत की इस ऐतिहासिक और अमूल्य धरोहर से जो नक्काशीदार धातु मंजूषाएं और पवित्र अवशेष कनिंघम को मिले थे, वे आज भारत में नहीं हैं। वर्तमान में ये सभी कलाकृतियां लंदन के प्रसिद्ध 'विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय' तथा 'ब्रिटिश संग्रहालय' की दीर्घाओं में प्रदर्शित हैं।
चंद्रमा गिरी, सांची स्तूप गाइड।






























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