​-सलामतपुर थाना क्षेत्र के अंबाडी गांव में 10 दिनों से जमाया डेरा, रावण, शूर्पणखा से लेकर जींद और आदिवासी के रूप में बिखेर रहे लोककला की छटा

-​राजा-महाराजाओं के दौर से शुरू हुई चार पीढ़ियों की यह परंपरा, आज आधुनिकता की अंधी दौड़ और घटती सहृदयता के बीच भी संघर्षरत

​अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

आधुनिकता की तेज़ रफ्तार, हर हाथ में थमे स्मार्टफोन, हाई-स्पीड इंटरनेट और टेलीविजन के इस मायावी दौर में जहां पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खोती जा रही हैं, वहीं कुछ ऐसे भी फनकार हैं जो इस ढलती शाम में भी कला का चिराग रोशन किए हुए हैं। राजस्थान के निवासी इंसाफ खान (पिता पप्पू खान) एक ऐसा ही नाम हैं, जो अपनी पुश्तैनी 'बहरूपिया कला' को बचाने के लिए दर-दर की खाक छान रहे हैं। वे गांव-गांव घूमकर न सिर्फ तरह-तरह के स्वांग रचते हैं, बल्कि आधुनिक मनोरंजन के शोरगुल के बीच पारंपरिक लोक संस्कृति का जादू भी बिखेरते हैं।

​वर्तमान में इंसाफ खान मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के अंतर्गत आने वाले सलामतपुर थाना क्षेत्र के अंबाडी गांव में अपनी टोली के साथ डेरा डाले हुए हैं। वे हर दिन एक नया रूप, एक नया किरदार और एक नई कहानी लेकर ग्रामीणों के बीच पहुंचते हैं, जिसे देखकर बूढ़े, बच्चे और महिलाएं सभी आश्चर्यचकित और आनंदित हो उठते हैं।

चार पीढ़ियों का सफर और एक गांव में 10 दिन का पड़ाव--बहरूपिया कला सिर्फ एक अभिनय नहीं, बल्कि जीवन जीने का ढंग और रोजी-रोटी का मुख्य जरिया है। इंसाफ खान बताते हैं कि उनका परिवार मध्य प्रदेश में पिछले चार पीढ़ियों से इस कला का प्रदर्शन करता आ रहा है। वे करीब 10 सदस्यों के अपने पूरे कुनबे के साथ यात्रा करते हैं। किसी भी एक गांव में उनका पड़ाव लगभग 10 दिनों का होता है। ​इन 10 दिनों में इंसाफ खान कभी पौराणिक पात्र 'रावण' और 'शूर्पणखा' के रूप में प्रकट होते हैं, तो कभी रहस्यमयी 'जींद' या ठेठ 'आदिवासी' की वेशभूषा धारण कर लोगों के सामने आ खड़े होते हैं। उनके हाव-भाव, पोशाक, संवाद और सजीव अभिनय को देखकर कोई भी धोखा खा सकता है। यही इस बहरूपिया कला की असली खूबसूरती और महारत है।

अतीत का स्वर्णिम दौर बनाम आज की चुनौतियां--इंसाफ खान के अनुसार, उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के दौर में अपनी कला का प्रदर्शन किया करते थे। उस समय राजदरबारों से लेकर आम जनता के बीच बहरूपिया कलाकारों को बहुत आदर, मान-सम्मान और पर्याप्त प्रोत्साहन मिलता था। लोग इस कला को देखने के लिए उत्सुक रहते थे और कलाकारों को दिल खोलकर दान-दक्षिणा दी जाती थी। ​लेकिन आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। डिजिटल दौर ने मनोरंजन के तरीके भले ही आसान और असीमित कर दिए हों, लेकिन इसने लोककलाओं के दर्शक छीन लिए हैं। अब न तो लोग पहले की तरह रुककर लोककलाओं का आनंद लेते हैं और न ही कलाकारों को वैसा आर्थिक सहयोग या सम्मान मिल पाता है। इसके बावजूद, इंसाफ खान ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। मुश्किल माली हालात और दर्शकों की कमी के बावजूद वे इस विरासत को अपनी अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित करने और बहरूपिया कला की सांसें चलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

इनका कहना है।

​हमारे पूर्वज राजा-महाराजाओं के समय से ही अलग-अलग रूप धारण कर लोगों का मनोरंजन करते आए हैं। मध्य प्रदेश में हमारी करीब चार पीढ़ियां इस बहरूपिया कला का प्रदर्शन कर रही हैं। हम 10 सदस्यों के परिवार के साथ एक गांव में लगभग 10 दिन रुकते हैं। इस दौरान रावण, शूर्पणखा, जींद और आदिवासी जैसे कई रूप बदलकर लोगों के बीच जाते हैं। यही कला हमारे परिवार के पालन-पोषण का एकमात्र जरिया है। आज मोबाइल और इंटरनेट के दौर में लोग मनोरंजन के नए साधनों से जुड़ गए हैं, जिससे हमारी लोककला के लिए प्रोत्साहन और सम्मान दोनों कम हुआ है। इसके बाद भी हम हार नहीं मान रहे और अपनी पुश्तैनी कला को जिंदा रखने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

इंसाफ खान, बहरूपिया कलाकार।

 

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28