ईरान के हमलों के बाद सऊदी अरब को नहीं रहा अमेरिका पर भरोसा
दुबई। सऊदी अरब के विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान ने अमेरिका को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अब अमेरिका पर निर्भर रहने का दौर खत्म हो चुका है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि जब वह अपने ही देश की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं, तो सऊदी अरब की रक्षा कैसे करेंगे। उनके इस बयान को क्षेत्रीय राजनीति में बदलते समीकरणों और अमेरिका पर घटती निर्भरता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सऊदी अरब का युद्ध के समय में ऐसा कहना इसलिए अहम है क्योंकि ईरान युद्ध में उसे बीच में होने की वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ा है। सऊदी में मौजूद मिलिट्री बेस पर ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें दागीं। इस युद्ध की वजह से होर्मुज ब्लॉक होने से सऊदी को आर्थिक नुकसान हुआ, जबकि उसकी ऑयल रिफायनरीज पर भी ईरान ने हमला किया और अमेरिका कुछ नहीं कर पाया। इन्हीं घटनाओं की वजह से फिलहाल परिस्थिति ये है कि सऊदी को अमेरिका पर जो भरोसा हुआ था, वह अब टूट चुका है।
अमेरिकी अखबार के मुताबिक सऊदी अरब, अमेरिका पर दबाव डाल रहा है कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नौसैनिक घेराबंदी तुरंत हटा ले और दोबारा बातचीत की मेज पर लौट आए। सऊदी और अन्य खाड़ी देशों को डर है कि अगर अमेरिका ने घेराबंदी जारी रखी तो ईरान बदला लेने के लिए उनके वैकल्पिक रास्ते भी बंद कर सकता है। ऐसी स्थिति उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगी। बता दें फिलहाल सऊदी का तेल लाल सागर के रास्ते बाब अल मंदेब से जाता है। अगर युद्ध बढ़ा, तो ये रास्ता भी बंद होने के आसार हैं और सऊदी ये बिल्कुल नहीं चाहता।
बता दें 2017 में ट्रंप सत्ता में आए तो अमेरिका-सऊदी संबंध काफी खराब हालत में थे। ओबामा प्रशासन ने 2015 में ईरान के साथ परमाणु समझौता किया था, जिसे सऊदी अरब अपना सुरक्षा खतरा मानता था। सऊदी को लगा कि अमेरिका ईरान को मजबूत कर रहा है और खाड़ी में अपने पुराने सहयोगी को नजरअंदाज कर रहा है। ट्रंप ने सत्ता संभालते ही ये रिश्ते मजबूत और व्यक्तिगत स्तर पर सुधारने का फैसला किया। मई 2017 में ट्रंप ने अपना पहला विदेश दौरा सऊदी अरब से शुरू किया। इस दौरान अमेरिका और सऊदी ने 110 बिलियन डॉलर का प्रभावी हथियार सौदा किया।
रिपोर्ट के मुताबिक 10 साल में कुल 350 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ। इसमें टैंक, युद्धपोत, मिसाइल डिफेंस सिस्टम, रडार और साइबर सुरक्षा उपकरण शामिल थे। यह सौदा ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए था। ट्रंप ने ओबामा के ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाला और ईरान पर भारी प्रतिबंध लगाए, तब सऊदी को ये उसके लिए सबसे बेहतर लगा। हालांकि अब हालात अलग हो चुके हैं और सऊदी को यही अमेरिका खतरा नजर आ रहा है।

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