-शबे कद्र अल्लाह की खास मेहरबानी की रात 

अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

नगर की जामा मस्जिद में सोमवार रात्रि को 27 दिन की तरावीह पूरी हुई। इस दौरान तरावीह पढ़ाने वाले जामा मस्जिद के पेशे ईमाम आलिम नसीम अहमद ने मुल्क में अमन ओ चेन के लिए दुआ की। दुआ के बाद बस्ती के सभी लोगों को तबर्रुख वितरण किया गया। वहीं पेशे ईमाम नसीम अहमद ने बताया कि माह ए रमज़ान की सत्ताइसवीं रात को ही शबे कद्र यानी परम सम्मानीय रात कहा जाता है। यह अल्लाह की खास मेहरबानी की रात है। इसीलिए अमूमन इसे ही ‘शबे कद्र’ कहा जाता है। क्योंकि इसे परम पवित्रता का दर्जा प्राप्त है। छब्बीसवां रोज़ा इसीलिए मुकद्दस पवित्र कहा जाता है क्योंकि इस रोज़े के दिन के बाद इफ़तार के बाद सत्ताइसवीं रात शुरू हो जाती है। जिसे शबे कद्र कहा जाता है। यह रात शबे कद्र इबादत के लिहाज से ऊंचा मुकाम रखती है। सवाल उठता है कि शब ए कद्र क्या है? जवाब यह है कि इस रात को 'शक्ति', 'भाग्य' या 'गुण की रात' कहा जाता है।रमज़ान माह के आखिरी अशरे यानी निजात मुक्ति/छुटकारा के अशरे में आने वाली शब ए कद्र सबसे पवित्र रात है । अब दूसरा सवाल यह है कि इस शबे कद्र की ऐसी क्या खासियत है कि जो इसे इतनी अहमियत दी गई है? इसका जवाब उन्होंने यह बताया है कि जैसे नदियों में कोई नदी बहुत खास होती है। पर्वतों में कोई पर्वत बहुत खास होता है। दरख्तों में कोई दरख़्त बहुत खास होता है । परिंदों में कोई परिंदा और दिनों में कोई दिन बहुत खास होता है। वैसे ही रातों में कोई रात बहुत खास होती है। वो है शबे कद्र इसीलिए ये खास है। क्योंकि इसी रात को पवित्र कुरआन का नुजूल हुआ था। सूरहकद्र में जिक्र है यानी अल्लाह का इशारा है कि यकीनन हमने इसे कुरआन को शब ए कद्र में नाज़िल किया। शबे कद्र हजार महीनों से बेहतर है। शबे कद्र में इबादत यानी अल्लाह की इनायत होना है।

यह रात ईमान, इबादत और नेकी के लिए अनमोल अवसर प्रदान करती है---कुरआन-ए-पाक की सूरह अल-क़द्र (सूरह 97) में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि यह रात हज़ार महीनों से बेहतर है। इस रात कुरआन की पहली आयतें फरिश्ते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल होना शुरू हुईं। इस्लामी मान्यता के अनुसार इस रात फरिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं, रहमत और बरकत लेकर हर महत्वपूर्ण काम को अंजाम देते हैं। सुबह तक सारी रात सुकून और अमन से भरी रहती है। मुसलमान इस रात को रमज़ान के आखिरी अशरे (21 से 29 तक) में तलाश करते हैं, खासकर 27वीं रात को अधिक महत्व दिया जाता है। इस मुबारक रात में नमाज़, कुरआन की तिलावत, तस्बीह, दुआएं और तौबा-इस्तिगफार का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादत से अफज़ल होती है और दुआएं कबूल होने की प्रबल संभावना रहती है। शबे क़द्र मुसलमानों के लिए अल्लाह की रहमत, मगफिरत और तकदीर के फैसलों का प्रतीक है। यह रात ईमान, इबादत और नेकी के लिए अनमोल अवसर प्रदान करती है।

 

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28