अदनान खान ​सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय 8-9 सितंबर को राष्ट्रीय सेमिनार का भव्य समापन हुआ। इस सेमिनार का मुख्य विषय 'वंदे मातरम्' का अवधारणात्मक बोध और राष्ट्र चेतना के विभिन्न ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक आयाम था, जिस पर शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने गहन विचार-विमर्श किया।

भारत माता की सनातन चेतना और ऐतिहासिक योगदान--कार्यक्रम की मुख्य अतिथि, त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग की सह-प्राध्यापिका डॉ. जय साहा ने ऐतिहासिक पटल पर निरंतर प्रवाहमान मातृ वंदना की चेतना के अंतर्निहित महत्व को रेखांकित करते हुए एक तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया। अपने सारगर्भित व्याख्यान में डॉ. साहा ने महर्षि अरबिंदो, ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, स्वामी विवेकानंद, सिस्टर निवेदिता, रवींद्रनाथ टैगोर और अवनींद्रनाथ टैगोर के स्वदेश बोध तथा राष्ट्रीय पुनर्जागरण में उनके अतुलनीय योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। ​इसके साथ ही उन्होंने भारतीय राष्ट्र चेतना का खाड़ी देशों की संस्कृति के साथ तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया और स्वतंत्रता संग्राम में अनुशीलन समिति के योगदान का विशेष उल्लेख किया। औपनिवेशिक काल के दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए डॉ. जय साहा ने एक महत्वपूर्ण विचार साझा किया: "भारत माता कभी पराधीन नहीं थी। यह सृष्टि की प्रकृति माता की विधायक योजना थी अपने सोये हुए पुत्रों को जगाने की।

विश्व माता' से 'देश माता' तक का वैचारिक सफर--शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभाकर पांडे ने अतिथि वक्ता के रूप में 'विश्व माता' की वृहद अवधारणा से लेकर 'देश माता' तक के सांस्कृतिक व आध्यात्मिक सफर को चिन्हित किया। उन्होंने श्रोताओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि 'वंदे मातरम्' केवल एक गीत या नारा नहीं, बल्कि एक सिद्ध मंत्र है। इस मंत्र की ऊर्जा का वास्तविक क्रियान्वयन पूरी तरह से त्याग और समर्पण की भावना से ओत-प्रोत है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और वैश्विक संस्कृति को देन--कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते हुए अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक प्रो. नवीन कुमार मेहता ने कहा कि राष्ट्रभक्ति और स्वदेश बोध को समझने की दिशा में यह आयोजन एक ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि 'वंदे मातरम्' के गूढ़ अर्थ को सही रूप में समझना और उसे नई पीढ़ी तक स्थानांतरित करना ही भारतीय संस्कृति की ओर से संपूर्ण वैश्विक संस्कृति को एक अमूल्य देन होगी।​इस गरिमामय आयोजन में विश्वविद्यालय के उपकुलसचिव विवेक पाण्डेय भी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में संयोजिका एवं चित्रकला विभाग की प्राध्यापिका डॉ. सुस्मिता नन्दी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और सहयोगियों का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28