मंगोलिया भेजे गए बुद्ध के शिष्यों के अस्थि कलश, सांची में दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर
-बुलेटप्रूफ बॉक्स में दिल्ली पहुंचे, 11 जून को लौटेंगे
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)
विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ सांची से मंगलवार (28 मई) को भगवान गौतम बुद्ध के परम शिष्यों अर्हन्त सारिपुत्र और अर्हन्त महामोग्गलान के पवित्र अस्थि कलश मंगोलिया के लिए रवाना कर दिए गए। यह दूसरी बार है जब इन अवशेषों को दर्शन के लिए विदेश भेजा जा रहा है, इससे पहले इन्हें दो साल पहले थाईलैंड भेजा गया था। अस्थि कलशों को कड़ी सुरक्षा के बीच सड़क मार्ग से भोपाल एयरपोर्ट लाया गया, जहां से विशेष विमान के जरिए इन्हें दिल्ली भेजा गया है। सांची के चैतियगिरी विहार मंदिर के मुख्य तहखाने से मंगलवार सुबह 7 बजे 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी में अस्थि कलशों को बाहर निकाला गया। इसके बाद बौद्ध भिक्षुओं ने करीब डेढ़ घंटे तक मंत्रोच्चार के साथ विशेष पूजा-अर्चना की। सुबह 9 बजे सशस्त्र सुरक्षा बलों द्वारा 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिए जाने के बाद कलशों को बुलेटप्रूफ और शॉक-प्रूफ विशेष बॉक्स में सील कर भोपाल रवाना किया गया।
दिल्ली में तकनीकी जांच के बाद 29 मई को जाएंगे मंगोलिया--भोपाल एयरपोर्ट पर गरिमामय विदाई समारोह के बाद अवशेषों को दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय भेज दिया गया है। यहां तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 29 मई को इन्हें मंगोलिया ले जाया जाएगा। रायसेन एसडीएम मनीष शर्मा ने बताया कि केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की विशेष टीम ने सांची में भी कलशों का भौतिक सत्यापन और वैज्ञानिक जांच की थी। इस पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराकर पंचनामा भी तैयार किया गया है।
राजकीय अतिथि का दर्जा और 'सोवरेन गारंटी' की सुरक्षा--इन पवित्र अवशेषों को हमेशा राजकीय अतिथि का दर्जा दिया जाता है और पूरी यात्रा के दौरान ये 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा घेरे में रहते हैं। दोनों देशों के बीच कानूनी सुरक्षा को लेकर 'सोवरेन गारंटी' नाम का एक सख्त समझौता होता है। कलशों को स्मार्ट क्लाइमेट कंट्रोल केस में रखा जाता है। सुरक्षा कारणों से यात्रा का रूट पूरी तरह गोपनीय रहता है और एडवांस पायलट वाहन साथ चलता है। इसके अलावा एएसआई की टीम माइक्रोग्राम स्तर तक वैज्ञानिक जांच कर इनका डिजिटल लॉग भी तैयार करती है।
मंगोलिया के ऐतिहासिक मठ में होंगे दर्शन--मंगोलिया की राजधानी उलानबटार स्थित गंडन तेगचेनलिंग मठ में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए इन अस्थि कलशों को रखा जाएगा। वर्ष 1809 में तिब्बती शैली में बना यह मठ मंगोलिया का सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक बौद्ध केंद्र माना जाता है। यहां 26 मीटर ऊंची स्वर्णमंडित अवलोकितेश्वर प्रतिमा स्थापित है और 100 से अधिक भिक्षु निवास करते हैं। मंगोलिया में करीब 10 दिन के प्रवास के बाद 10 जून को ये कलश वापस दिल्ली लौटेंगे और 11 जून को इन्हें सांची में फिर से सुरक्षित स्थापित कर दिया जाएगा।
पीएम मोदी के कार्यकाल में शुरू हुई परंपरा- मंत्री पटेल--कलश रवानगी के दौरान पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह नई परंपरा शुरू हुई है। पहले ये अस्थियां विदेशों में थीं, जिन्हें भारत लाया गया और अब सम्मानपूर्वक दर्शन के लिए विभिन्न देशों में भेजा जा रहा है। महाबोधि सोसायटी श्रीलंका के प्रमुख वानगल उपतिस नायक थेरो ने कहा कि भारत की इस अमूल्य विरासत के मंगोलिया पहुंचने से दोनों देशों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध मजबूत होंगे। इससे सांची में विदेशी पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि होगी।
ये अधिकारी रहे मौजूद--इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मंत्री प्रहलाद पटेल और वानगल उपतिस नायक थेरो के अलावा रायसेन कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा, एसपी आशुतोष गुप्ता और भारत सरकार के संस्कृति विभाग के निदेशक यश सक्सेना सहित कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।

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