​अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर खबर पर पैनी नज़र)

कागजों पर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं भले ही 'शत-प्रतिशत सफल' और चमकदार नजर आती हों, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद कड़वी और पथरीली है। रायसेन जिले के सांची विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम अंबाडी से एक ऐसी ही दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यहाँ एक बुजुर्ग मंगल सिंह मोगिया सिस्टम के भरोसे अपनी जिंदगी काटने को मजबूर हैं।

न सिर पर छत, न पेट भरने का सहारा--बुजुर्ग मंगल सिंह मोगिया की जिंदगी इस उम्र में मुफलिसी और अकेलेपन के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उनकी पत्नी का निधन पहले ही हो चुका है और उनकी कोई संतान नहीं है, जो इस मोड़ पर उनका हाथ थाम सके। जिस उम्र में आराम और सम्मान मिलना चाहिए, उस उम्र में मंगल सिंह एक किराए के मकान में रहने को मजबूर हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएम आवास) जैसी बड़ी योजना का लाभ आज तक उन तक नहीं पहुँच सका है, जिससे उनके पास अपना एक अदद घर भी नहीं है।

तीन महीने से बंद है पेंशन: 'साहब, अब मजदूरी भी नहीं होती--

मंगल सिंह का कहना है कि अब शरीर में इतनी ताकत नहीं बची कि वे मजदूरी करके अपना पेट पाल सकें। सरकार की तरफ से मिलने वाली थोड़ी-बहुत वृद्धावस्था पेंशन ही उनका एकमात्र सहारा थी, जिससे उनकी गुजर-बसर चलती थी। लेकिन व्यवस्था की मार देखिए कि पिछले तीन महीने से वह पेंशन भी बिना किसी ठोस कारण के बंद पड़ी है। ​"जब पेट खाली हो, तो ऑनलाइन पोर्टल, केवाईसी, आवेदन और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया जैसे शब्द किसी क्रूर मजाक की तरह लगते हैं।"

दफ्तरों के चक्कर और फाइलों की धूल--आज मंगल सिंह जैसे बेसहारा बुजुर्ग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के कारण योजनाएं सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सिस्टम को एक लाचार बुजुर्ग की भूख और उसकी बुनियादी जरूरतों से ज्यादा, दफ्तरों की अलमारियों में रखी फाइलों की धूल झाड़ने की चिंता है।

सरकारी विज्ञापनों और हकीकत में बड़ा फासला--यह मामला प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है:

​पहला सवाल: जब योजनाएं सबसे निचले तबके और बेसहारा लोगों के लिए बनी हैं, तो मंगल सिंह जैसे लोग इससे अछूते क्यों हैं?

​दूसरा सवाल: डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन प्रक्रियाओं के बीच उन बुजुर्गों का क्या दोष, जो तकनीक को नहीं समझते और दफ्तरों के बाबू उन्हें दुत्कार देते हैं? ​क्या गरीब और बेसहारा नागरिक सिर्फ चुनावी भाषणों, नारों और चमचमाते पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएंगे? सांची विकासखंड के इस मामले में अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन कब जागता है और इस बुजुर्ग को उनका हक कब तक मिल पाता है।

इनका कहना है।

शासन स्तर का काम है। हमारे यहां से यह काम बहुत पहले बंद हो गया है।वृद्धवस्था पेंशन अभी आई नही है।

शंकरलाल पांसे, सीईओ जनपद सांची।

अभी पेंशन किसी की भी नही आई है। क्योंकि सभी पेंशन धारियों का सत्यापन हो रहा है। पंचायत में 30 नाम है। सबका सत्यापन किया जा रहा है।मंगल सिंह का सत्यापन कर दिया है। और उनका नाम पीएम आवास की लिस्ट में भी जोड़ दिया है।

पंकज बेदी, रोजगार सहायक अंबाडी।

न्यूज़ सोर्स : अदनान खान एडिटर इन चीफ IND28