भीषण गर्मी की मार: सांची से भी सुंदर ‘सतधारा स्तूप’ पर पसरा सन्नाटा, सैलानियों का टोटा
-तपिश में बुझ गई पर्यटन की रौनक, भीषण गर्मी ने रोके सैलानियों के कदम
अदनान खान सलामतपुर रायसेन। (एडिटर इन चीफ IND28 हर ख़बर पर पैनी नज़र)
सांची के विश्व प्रसिद्ध स्तूपों से महज कुछ ही दूरी पर स्थित और अपनी प्राकृतिक व ऐतिहासिक सुंदरता के लिए विख्यात 'सतधारा स्तूप' इन दिनों भीषण रूप से खाली पड़े हैं। आसमान से बरसती आग और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के कारण इस खूबसूरत ऐतिहासिक स्थल पर पर्यटकों का टोटा लग गया है। सैलानियों की कमी के चलते पूरा परिसर पूरी तरह से सूना नजर आ रहा है।
सांची से भी अधिक सुरम्य, पर मौसम की मार से बेहाल--इतिहास और प्रकृति प्रेमियों के अनुसार, सतधारा स्तूप अपनी भौगोलिक स्थिति और शांत वातावरण के मामले में सांची के स्तूपों से भी अधिक सुंदर और आकर्षक माना जाता है। पहाड़ी पर बसे इस परिसर के पास से बहती हलाली नदी और चारों ओर फैली हरियाली पर्यटकों को एक अलग ही सुकून का अहसास कराती है। लेकिन इस साल जून के महीने में पड़ रही अत्यधिक गर्मी और झुलसाने वाली लू (हीटवेव) ने पर्यटकों के कदम रोक दिए हैं। दोपहर के समय तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि यहां तैनात सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों के अलावा कोई दूसरा इंसान ढूंढने से भी नहीं मिलता।
पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट--स्थानीय दुकानदारों और गाइडों का कहना है कि आमतौर पर सप्ताहांत (वीकेंड) पर यहाँ भोपाल, विदिशा, रायसेन और दूर-दराज के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग पिकनिक मनाने और इतिहास को करीब से जानने आते थे। लेकिन इस बार पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाने के कारण सैलानियों ने घरों से बाहर निकलना बंद कर दिया है। एक स्थानीय गाइड ने बताया:"सतधारा की खूबसूरती इसके खुले वातावरण और चढ़ाई में है। लेकिन इस भीषण गर्मी में पथरीली चट्टानों और स्तूपों के आसपास इतनी तेज तपिश होती है कि लोग 10 मिनट भी खड़े नहीं रह पाते। सुबह और शाम को इक्का-दुक्का लोग आ जाएं तो बड़ी बात है, वरना पूरा दिन सन्नाटा पसरा रहता है।"
ठप हुआ स्थानीय रोजगार---पर्यटकों की इस अनुपस्थिति का सीधा असर यहाँ आसपास के स्थानीय रोजगार पर पड़ा है। स्तूप परिसर के बाहर वाहन पार्किंग, छोटे-मोटे खान-पान के ठेले और सांची के हस्तशिल्प बेचने वाले दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। गर्मी के कारण पर्यटकों के न आने से उनका दैनिक व्यवसाय पूरी तरह से ठप है। दुकानदारों को अब बस इस भीषण गर्मी से राहत मिलने और मानसून की पहली फुहार का इंतजार है, ताकि मानसून के आते ही यह पहाड़ी एक बार फिर पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हो सके।
भोपाल विदिशा मुख्यमार्ग से 7 किमी की दूरी पर स्तिथ हैं सतधारा के स्तूप----- सतधारा स्तूप की प्रसिद्धि और यहां सुविधाओं के नाम पर कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। विडंबना यह है कि वह पूरातत्व विभाग सतधारा के स्तूपों का अच्छे से प्रचार-प्रसार नहीं कर रहा है। वहीं यूनेस्को द्वारा प्रदत राशि से किया गया निर्माण कार्य भी संतोषजनक नहीं है। वर्ष 99 में हुए इस जीणोद्धार के बाद जनवरी 2005 में यूनेस्को के पुरा-विशेषज्ञों के दल ने इस पर असंतुष्टि जताते हुए इस को तोड़कर दोबारा निर्माण करने के निर्देश दिए थे। एक विचित्र स्थिति यह भी है कि उक्त भूमि पहले वन विभाग के अधीन थी। काफी समय बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ट्रांसफर हुई है। यहां बिजली, संचार एवं अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है। यहां आने के लिए करोडों रुपए की राशि का सड़क मार्ग भी नया बनाया गया था। लेकिन वह भी अब जगह-जगह से खराब हो चुका है। उसके बाद भी पर्यटक यहां आने में असमर्थ होते हैं। इसलिए सांची से अधिक सुंदर इस स्थान को ना तो प्रसिद्धि मिल पा रही है। और और ना ही पर्यटन की दृष्टि से कोई लाभ हो पा रहा है। पुरातत्व विभाग द्वारा प्रशासन को कई बार पत्र लिखे जाने के बावजूद भी यहां पर व्यवस्थाएं नहीं सुधरी है।
सतधारा का ऐतिहासिक महत्व--हलाली नदी के दाएं किनारे पहाड़ी पर स्थित बौद्ध स्मारक सताधारा की खोज ए कन्धिम ने की थी। मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए स्तूप का निर्माण कराया था। इस स्थल पर छोटे-बड़े कुल 27 स्तूप, दो बौद्ध बिहार तथा एक चैत्य है। वर्ष 1989 में इस स्मारक को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया। ईसा पूर्व 272-238 में सम्राट अशोक ने सांची स्तूप निर्माण के समय ही सतधारा में ईंटों का स्तूप बनवाया था। यहां मौजूद वैदिक स्तंभ में कमल पुष्प, आलेख सिंह, वेष्टित वृक्ष, मानवाकृति आदि अलंकरण सहित दानदाताओं के कई अभिलेख भी हैं। उत्खनन के दौरान बौद्ध सारिपुत्र तथा महागोपालन के अस्थि अवशेष मिले। यहां शैलाश्रय में बौद्ध का व्यक्ति चित्र, आठ स्तूप, बारह बिहार और एक मंदिर है। यह स्थान मौर्य काल में विकसित हुआ और गुप्त काल से इसकी उपेक्षा शुरू हुई। गौरतलब है कि सतधारा में मौर्य काल और गुप्त काल के कई महत्वपूर्ण बौद्ध स्तूप और अवशेष मौजूद हैं। इसे बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। सांची की तरह ही यहाँ भी भगवान बुद्ध के शिष्यों से जुड़े पवित्र अवशेष पाए गए थे। अपनी इसी ऐतिहासिक धरोहर और अछूती प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह स्थान पर्यटकों के दिलों में खास जगह रखता है, लेकिन फिलहाल मौसम के कड़े मिजाज ने इसकी रौनक छीन ली है।
इनका कहना है।
में पिछले हफ्ते बड़े ही हर्ष, उल्लास और उमंग के साथ सतधारा के बौद्ध स्तूप अपने परिवार के साथ गया था। मन में कई सारी उमंगे और उत्सुकता थी कि वहां के स्तूप की प्राकृतिक सौन्दर्यता तो मंत्रमुग्ध कर देगी। किन्तु तब परिवार और बच्चों के साथ वहां जाना एक श्राप और सज़ा जैसा लगा। क्योंकि यहां पर सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नही है। जबकि यह स्थान सांची से अधिक सुंदर है। हमारा तो सारा मज़ा ही किरकिरा हो गया और हमें स्तूप का आनंद लिए बिना ही घर वापस लौटना पड़ा।
रोहित शर्मा, पयर्टक भोपाल।
प्रत्येक शनिवार रविवार को लगभग सौ पर्यटक इतिहास और पुरातत्व का आनन्द लेने सतधारा बौद्ध स्तूप आते रहे हैं। चारों ओर हरियाली का मनमोहक द्रश्य और शांत वातावरण पर्यटकों का मन मोह लेता है। किन्तु भीषण गर्मी के चलते सतधारा स्तूप सुना पड़ा हुआ है। वहीं स्थानीय रोजगार पर भी इसका खासा असर हुआ है।
असद खान, पर्यटक विदिशा।

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